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satyata ka parman
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अपनी सत्यता का प्रमाण – ज्ञानवर्धक हिंदी कहानी

दिनों – दिन तेनालीराम की बढ़ती लोकप्रियता से कुछ दरबारी बड़े दुखी थे। महाराज उसकी हर बात को सहर्ष मान लेते थे और उन्हें नीचा देखना पड़ता था। एक दिन तेनालीराम से ईर्ष्या करने वालों ने विचार किया कि तेनालीराम के विरुद्ध राजा कृष्णदेव के कान भरे जाए। उसकी उन्होंने एक युक्ति सोची कि हर रोज एक दरबारी राजा से उसकी बात की शिकायत करेगा, जिससे राजा को उनकी शिकायत में सच्चाई नजर आ जाए और वे इस तेनालीराम की मुसीबत से मुक्ति पा जाए।

बस फिर क्या था ? अगले ही दिन से उन दरबारियों ने अपने – अपने हथकंडों का प्रयोग करना शुरू कर दिया।

एक दरबारी राजा के कान के पास फुसफुसाकर बोला, महाराज ! कुछ सुना हैं आपने ?

क्यों क्या हुआ ? राजा ने उससे जानना चाहा।

महाराज ! अपराध क्षमा करें, तो कहने की हिम्मत करूं।

हाँ – हाँ कहो, क्या बात हैं।

महाराज, सुनने में आया हैं कि आजकल आपके प्रिय तेनालीराम खूब धन बटोर रहे है। उनपर आपका वरदहस्त हैं, इसलिए लोग उसकी हर बात मानने पर मजबूर हैं। यदि वे आपसे उनकी शिकायत भी करें, तो आप उन लोगों द्वारा की गयी शिकायत पर कभी विश्वास नहीं करेंगे। उस दरबारी ने काफी प्रभावशाली ढंग से राजा कृष्णदेव के सामने अपनी बात रखी।

हाँ दरबारी यह तो सच हैं। फिर भी मुझे तुम्हारी साहस की सराहना करनी पड़ती हैं कि तुमने तेनालीराम की मुझसे शिकायत करने का साहस तो किया। दरबारी ने जब राजा कृष्णदेव के मुंह से जब यह सुना तो उसकी तो जान ही निकल गयी।

आया तो था वह तेनालीराम की शिकायत करने पर प्यार से पूरी बात सुनकर राजा ने उसे ही झिड़क दिया। वह बेचारा अपना सा मुंह लेकर वहाँ से दुम दबाकर भाग गया।

पर तेनालीराम से ईर्ष्या करने वाले दरबारी भी बड़े काइयां थे। वे अपनी असफलता पर सहज ही हार मानने वाले नहीं थे।

सलाह के मुताबिक़ दुसरे दिन एक अन्य दरबारी राजा के पास गया और उसने भी खूब बढ़ – चढ़कर तेनालीराम की उससे शिकायत की। अब तो कोई न कोई दरबारी रोज ही राजा के दरबार में पहुंचता और तेनालीराम की उनसे शिकायत करता।

लगभग पंद्रह – बीस दिन तक दरबारियों की शिकायत का यह क्रम चलता रहा। अब तो राजा कृष्णदेव भी विचालित हो गए। उन्हें  भी दरबारियों की बातों में सच्चाई नजर आने लगी।

राजा कृष्णदेव सोचने लगे कि शायद दरबारियों की बातों में कुछ तो सच्चाई हैं। तेनालीराम वास्तव में ही धन – लोलुप हैं, तभी तो उसके खिलाफ इतनी शिकायतें सुनने को मिल रही हैं। अब तो तेनालीराम को दंड देना ही पड़ेगा। यदि उसे दंड नहीं दिया गया, तो मेरी न्यायप्रियता को जनता मानेगी ही नहीं।

अगले दिन राजा कृष्णदेव ने तेनालीराम को दरबार में बुलाया और कहा, तेनालीराम तुम्हारे खिलाफ रिश्वतखोरी की शिकायतें हमें पिछले कुछ दिनों से सुनने को मिल रही हैं।

महाराज, मैं और भ्रष्टाचारी ? यह कभी संभव हो सकता हैं। यही तो मैं भी समझता था। तभी तो मैंने कभी तुम्हारी शिकायतों पर कोई गौर नहीं किया, किन्तु जब तुम्हारे विरुद्ध शिकायतों का अम्बार लग गया, तो मुझे भी उन शिकायतों पर विश्वास करना पड़ा इसलिए तुम या तो एक हफ्ते के अन्दर – अन्दर अपनी ईमानदारी का सबूत पेश करो, नहीं तो तुम्हें यह पद छोड़ना पड़ेगा।

राजा कृष्णदेव की बातों से तेनालीराम यह जान गया कि यह उसके खिलाफ उसके विरोधियों की कोई साजिश हैं। राजा कृष्णदेव की बातों से तेनाली के विरोधियों में खुशी की लहर दौड़ गयी, परन्तु वे अपनी खुशी का सार्वजनिक रूप से इजहार नहीं कर पा रहे थे।

तेनालीराम अब लाचार हो गया। वह कर भी क्या सकता था। शर्म से अपना सिर झुकाया दरबार में बैठा रहा। दरबार विसर्जित होने के उपरान्त कृष्णदेव ने उसे अपने निर्णय के बारे में फिर से याद दिलाया।

तेनालीराम ने सदैव की भाँति राजा को नित्य सिर झुकाकर अभिवादन किया और दबे पैरों अपने घर को चल दिया।

अगले दिन जैसे ही दरबार लगा, तेनालीराम का एक सेवक आँखों में आंसूं लिए दरबार में उपस्थित हुआ और एक पत्र प्रधानमंत्री के हाथों में सौंप दिया।

प्रधानमंत्री ने वह पत्र पढ़ना आरम्भ किया। पत्र में लिखा था, महाराज आपको बारम्बार प्रणाम स्वीकार हो।

कल मुझ बेक़सूर को भरे दरबार में लज्जित होना पड़ा और मेरे सभी साथी मेरे खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप सुनकर चुप बैठे रहे। इससे मुझे महसूस हुआ मानो उन्होंने भी मुझे दोषी मान लिया हैं। ऐसी स्थिति को भला मुझ जैसा व्यक्ति कैसे सहन कर सकता था। मैं ऐसे जीवन से मृत्यु को गले लगाना बेहतर समझता हूँ, इसलिए मै स्वयं को मौत के हवाले करने जा रहा हूँ। भगवान् आपको चिरायु दे आपसे जो स्नेह मुझे मिला उसके लिए मैं आपका आभारी हूँ।

आपका सेवक तेनालीराम

पत्र सुनते ही राजा कृष्णदेव की आँखें भर आयी। वह बोले, मैं भी कैसा पागलपन कर बैठा, जो लोगों की बातों में आकर तेनालीराम को दंड दे बैठा। तेनालीराम जैसा व्क़फादार और स्वामिभक्त अब कहाँ से मिलेगा ?

आप बिलकुल सही कह रहे हैं, महाराज ! तेनालीराम बहुत बहुत ही विद्वान एवं सत्यवादी था और इन सब गुणों के साथ – साथ वह सबका हित चाहने वाला और हंसोड़े प्रकृति का व्यक्ति था। सारे दरबारियों ने एक स्वर में कहा।

राजा कृष्णदेव ने देखा कि तेनालीराम की प्रशंसा के पुल बाँधने वाले अधिकारी दरबारी थे, जिन्होंने कुछ दिन पहले तेनालीराम की शिकायतें करने में कोई गुरेज नहीं किया था और तेनाली के विरुद्ध रोज राजा के कान भरे थे।

अब राजा कृष्णदेव को भी अपनी भूल का अहसास हुआ किन्तु अब हो कुछ नहीं सकता था।

फिर राजा के आदेश से वह सभा तेनाली की शोकसभा के रूप में परिवर्तित हो गयी। सभी तेनालीराम की आत्मा को शान्ति के लिए प्रार्थना कर रहे थे और तेनालीराम के गुणों की चर्चा कर रहे थे।

अभी यह शोक चल ही रहा था कि तभी राजदरबार में बैठे एक जटा – जूटधारी ने अपना जटाजूट उतार कर फेंका और सभा में उठकर खड़ा हो गया और बोला, महाराज की जय हो। महाराज ने स्वयं से और मेरे सभी दरबारी सह्योगियों ने मुझे एक स्वर में ईमानदार और सत्यवादी घोषित किया हैं। अब तो मेरी सच्चाई का सबूत आपको मिल गया होगा महाराज !

सभी उपस्थित जन वहाँ तेनालीराम की उपस्थिति से हैरान रह गए। राजा कृष्णदेव ने जब तेनालीराम को सही – सलामत देखा तो हँसते हुए बोले, तेनालीराम, तुमसे कोई जीत नहीं सकता। तुम्हारी बुद्धिमत्ता का पार पाना बेहद मुश्किल हैं। यह नाटक रचकर तुमने न केवल अपने आपको निर्दोष साबित कर दिया हैं, बल्कि अपने आलोचकों के मुंह पर भी ताला डाल दिया हैं।

राजा कृष्णदेव के मुख से ये बातें सुनकर तेनालीराम तो प्रसन्न हो गया लेकिन उससे द्वेष – भाव रखने वाले दरबारीजनों के चेहरे मायूसी से लटक गए।

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