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अनोखी चित्रकारी – ज्ञान से भरपूर कहानी

राजा कृष्णदेव ने अपने लिए नया महल का निर्माण करवाया जिसकी दीवारों पर उन्होंने एक प्रसिद्द कलाकार द्वारा बड़े सुन्दर चित्र बनवाये थे। एक दिन राजा कृष्णदेव अपने प्रमुख दरबारियों को उन चित्रों को दिखला रहे थे। चित्र देखकर सभी दरबारी ने उनकी मुक्त कंठ से प्रशंसा की, पर चतुर तेनालीराम मूक दर्शक ही बना रहा।

अचानक उसकी नजर एक ऐसे चित्र पर पड़ गयी, जिसमें एक व्यक्ति का एक ही ओर का चेहरा दिखाई देता था। तब उसने राजा से पूछा, महाराज इस व्यक्ति के चेहरे की दूसरा भाग कहाँ हैं ?

तुम भी अजीब मूर्ख हो तेनाली ! राजा ने प्रत्युत्तर में हँसते हुए कहा, जो भाग दिखाई नहीं देता उसकी तो कल्पना ही करनी पड़ती हैं।

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राजा के इस उत्तर पर तेनालीराम चुप्पी साध गया। थोड़ा समय बीत जाने के बाद तेनालीराम ने एक दिन राजा से कहा, महाराज मैं कई दिनों से बड़ी लगन से चित्र बनाने की कला सीखा रहा हूँ। मैंने कई अच्छे – अच्छे चित्रकारों को इस कला में पीछे छोड़ दिया हैं ।

तब राजा कृष्णदेव बोले, ऐसी बात हैं तो ठीक हैं हमारे गर्मियों में रहने वाले भवन में दीवारों पर चित्र नहीं हैं। तुम उसकी दीवारों पर चित्र बनाकर अपनी कला के जौहर दिखलाओ।

फिर तेनालीराम बड़ी लगन के साथ अपने इस काम में जुट गया। एक महीने के बाद उसने राजा से कहा कि वह दरबारियों के साथ आकर उसके द्वारा बनाए हुए चित्र देखे।

राजा कृष्णदेव अपने दरबारियों के साथ महल में पहुंचे। उन्होंने जो कुछ वहाँ देखा, उसे देखकर कोई भी व्यक्ति अपने हाथों अपना सिर पकड़ने पर मजबूर हो जाता। सभी दीवारों पर मानव शरीर के अलग अलग अंगों के चित्र बने थे। कहीं घुटने का, कहीं कुहनी का, तो, कहीं नाक, कान आँख और मुंह आदि बने थे।

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तब क्रोध से बरसते हुए राजा ने पूछा, यह सब क्या हैं ? शरीर के अन्य अंग कहाँ चले गए ?

महाराज ! आपने ही तो कहा था चित्र में जो भाग नहीं बना होता उसकी हमें कल्पना करनी पड़ती हैं। बड़ी ही गंभीर मुद्रा में तेनालीराम ने यह बात कही।

राजा कृष्णदेव ने तभी दो सिपाही बुलवाए। ये वही सिपाही थे, जिन्हें तेनालीराम ने कोड़े खाने की सजा सुनवाई थी। फिर राजा ने हुकम दिया, ले जाओ इसे और इसका सिर धड़ से कलम कर दो। मैं तो तंग आ गया हूँ इस व्यक्ति से।

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वे दोनों सिपाही तेनालीराम को सजा देने ले जाते हुए बहुत ही प्रसन्न थे। आज उससे बदला लेने का सुनहरा मौक़ा जो हाथ लग गया था।

चलते – चलते तेनालीराम ने उससे कहा, मुझे मरना तो हैं ही, लेकिन आप लोगों की बड़ी कृपा होगी जो आप मुझे मरने से पहले किसी कमर तक पानी में खड़े होकर अंतिम प्रार्थना करे लेने दे, जिससे मेरी आत्मा को शान्ति मिल सके।

उन दोनों सिपाहियों ने आपस में विचार किया और सोचा, इसमें हर्ज ही क्या हैं। उन्होंने कहा, ठीक हैं, लेकिन कोई चालाकी करने की कोशिश हरगिज मत करना।

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आप दोनों मुझ पर कड़ी निगरानी रखना, यदि मैं भागने की कोशिश करू, तो बेशक मुझ पर वार कर देना।

ठीक हैं तुम तालाब में घुसकर अपनी अंतिम प्रार्थना कर सकते हो। और स्वयं तेनालीराम के दोनों ओर तलवारें निकालकर खड़े हो गए। प्रार्थना करते – करते अचानक तेनालीराम चिल्लाया, तलवार चलाओ। और खुद पानी में डुबकी लगा दी। घबराहट और जल्दबाजी में सिपाहियों ने तलवारी चला दी और अपनी जान से हाथ धो बैठे।

फिर तेनालीराम राजा कृष्णदेव के पास पहुंचा। उनका उसके प्रति क्रोध तब तक ठंडा हो चुका था।

उन्होंने हैरान होते हुए तेनाली से पूछा, तुम उन दोनों सिपाहियों के हाथों कैसे बच गए ?

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महाराज उन मूर्खों ने तो मुझे मारने के बजाय एक – दुसरे की ही जान ले ली और तेनालीराम ने सारा वृतांत कह सुनाया।

इस बार तो मैं तुम्हें क्षमा कर देता हूँ तेनाली। आइंदा से इस तरह की शरारतें तुमने की तो समझो तुम्हारी खैर नहीं।

ठीक हैं महाराज ! तेनाली ने कह तो दिया पर वह अपनी शरारतों से बाज कहाँ आने वाला था।

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