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अनोखा पुरस्कार – हिंदी ज्ञान से भरपूर कहानी

राजा कृष्णदेव के दरबार में एक दिन पड़ोसी देश के दूत ने प्रवेश किया वह उनके लिए अनेक उपहार भी साथ में लाया था। विजयनगर के राजदरबारियों ने उस दूत की खूब आव – भगत की। कुछ दिन रहकर जब दूत अपने देश वापस जाने लगा तो राजा कृष्णदेव ने भी अपने पड़ोसी देश के राजा के लिए कुछ बहुमूल्य उपहार भेंटस्वरुप उस दूत को दिए।

राजा कृष्णदेव उस दूत को भी कुछ उपहार देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने उस दूत से कहा, हम तुम्हें भी कुछ उपहार देना चाहते हैं। सोना, चांदी, हीरे, रत्न जो भी चाहिए मांग लो।

महाराज, मुझे यह सब कुछ नहीं चाहिए। यदि देना ही चाहते हैं तो मुझे कुछ ऐसा उपहार दीजिये, जो सुख में, दुःख में सदा मेरे साथ रहे और जिसे मुझसे कोई छीन न सके।

दूत की यह बात सुनकर राजा कृष्णदेव चकरा गए। उन्होंने उत्सुकता भरी नजरों से दरबारियों की ओर देखा। सबके चेहरे पर परेशानी व्याप्त थी। किसी की भी समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा उपहार कौन सा हो सकता हैं।

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तब राजा कृष्णदेव ने तेनालीराम से पूछा, क्या, तुम ऐसा कोई उपहार ला सकते हो जैसा उपहार इस दूत ने माँगा हैं ?

अवश्य महाराज, दोपहर को जब यह दूत महोदय यहाँ से प्रस्थान करेंगे तो वह उपहार इनके साथ ही होगा।

दोपहर होने पर जब दूत अपने देश को जाने के लिए तैयार हुआ तो उसके सारे उपहार एक शाही रथ में रखवा दिए।

जब राजा कृष्णदेव उस दूत को विदा करने लगे तो वह दूत बोला – महाराज ! मुझे वह उपहार तो अभी मिला ही नहीं, जिसको देने का आपने मुझसे वादा किया था।

राजा कृष्णदेव ने तेनालीराम की खोज में इधर – उधर नजर दौड़ाई। तेनाली उनके पास ही मौजूद था। उसे देखकर वह बोले, तेनालीराम, तूने वह उपहार लाकर नहीं दिया।

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इस पर तेनालीराम हंसकर बोला, महाराज वह उपहार तो इस समय भी इनके साथ ही हैं। लेकिन यह उसे देख नहीं पा रहे हैं। इनसे कहिये कि ज़रा पीछे मुड़कर देखें।

दूत ने जब पीछे मुड़कर देखा, तो उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया।

वह बोला, मुझे तो कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा हैं ?

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तब तेनालीराम मुस्कुराया और बोला, ज़रा ध्यान से देखिये दूत महोदय ! वह उपहार आपके पीछे ही हैं – आपकी हमसाया अर्थात आपकी परछाई। सुख में, दुःख में, जीवन – भर यह आपके साथ ही रहेगी और इसे आपसे कोई छीन भी नहं पाएगा।

यह बात सुनते ही राजा कृष्णदेव मुस्कुरा पड़े।

दूत भी प्रसन्न हो गया और बोला, महाराज ! मैंने तेनालीराम की बुद्धिमत्ता की काफी तारीफ़ सुनी थी, लेकिन आज साक्षात इस बात का प्रमाण भी मिल गया।

फिर दूत अपने रथ में बैठकर अपने देश को चला गया और राजा कृष्णदेव तेनाली से चुहल बाजी करते हुए महल में वापस लौट आये।

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