करूणा हैं ह्रदय का अमृत – सिद्धार्थ देवदत्त की कहानी

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किसी ने ज्ञानी से प्रश्न किया – को धर्मः ?

धर्म क्या है ?

ज्ञानी ने समाधान दिया – भूतदया। जीवों पर दया करना धर्म हैं। प्राणियों पर अनुकम्पा करना ही धर्म का आदि लक्षण हैं। दयावान के लिए सारा जगत उसका अपना हैं। निष्करुण के लिए कोई अपना नहीं हैं।

करुणा श्रेष्ठ ह्रदय का अमृत होता हैं। वह सदैव सर्वत्र बहता रहता हैं। उसकी अमृतधार में अनेकों प्राणी आत्मतोष पाते हैं। और निर्दयता ह्रदय का विष हैं। वह भी बिन बहाए बहता हैं। मूक प्राणी भी सदय और निर्दय ह्रदय को अनुभव कर लेते हैं।

अढाई हजार वर्ष पूर्व की एक घटना हैं।

सिद्धार्थ कपिलवस्तु के राजकुमार थे। एक दिन वे प्रातः भ्रमण के लिए निकले। अचानक उनके सामने एक हंस आ गिरा। वह हंस तीक्ष्ण बाण से बिंधा हुआ था। सिद्धार्थ का ह्रदय करुणाप्लावित हो उठा। उन्होंने उस मूक पक्षी को अपनी गोद में ले लिया और उसकी देह से खींचकर तीर निकाल दिया। सिद्धार्थ उस हंस की जख्म पर दवा लगाने लगे। इतनी ही देर में उन्ही का चचेरा भाई देवदत्त हाथ में धनुष लिए दौड़ा हुआ आया। उसने सिद्धार्थ से कहा – सिद्धार्थ यह हंस मेरा शिकार हैं। मुझे दे दो।

सिद्धार्थ बोले – इस पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं हैं , अतः मैं यह तुम्हें नहीं दूंगा।

देवदत्त कड़का – क्यों नहीं दोगे ? मैंने इसे आहत करके गिराया हैं। इस पर मेरा अधिकार हैं। तुम्हें मुझे देना होगा। यदि नहीं दोगे तो मैं न्यायालय में जाउंगा।

सिद्धार्थ बोले – जहां तुम जाना चाहो , जा सकते हो , लेकिन यह हंस तुम्हें नहीं मिलेगा।

अंततः बात न्यायालय तक पहुँच गयी। न्यायाधीश ने फैसला सुनाया – एक दिशा में सिद्धार्थ खड़े हो और दूसरी दिशा में देवदत्त। हंस को बीच में छोड़ा जाएगा जिसके पास वह जाना चाहेगा , वही इस हंस का स्वामी होगा।

और वैसा ही किया गया। हंस उछल कर सिद्धार्थ की गोद में जा बैठा।

वही सिद्धार्थ भविष्य के तथागत बुद्ध बने थे।

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