nak kan gale ka deshi elaz

नाक – कान व गले के रोग कारण एवं उपचार

बहरापन

कारण

केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र में स्थित श्रवण केंद्र रोगग्रस्त या क्षतिग्रस्त हो जाने से बाधिर्य हो सकता हैं। अन्तः कर्ण में स्थित श्रवन नाड़ी में शोथ या क्षीणता उत्पन्न होने से भी बधिरता हो सकती हैं। विष के प्रभाव से, लम्बे समय तक तम्बाखू के उपयोग से, फिरंग व संक्रमणजन्य तीव्र ज्वर के कारण भी यह नाड़ी प्रभावित हो सकती हैं। श्रवण मार्ग में अवरोध होने की स्थिति में बहरापन हो सकता हैं। कान के परदे पर चोट या संक्रमण होने तथा कान के अन्दर विद्यमान छोटी अस्थियाँ रोगग्रस्त हो जाने पर भी बाधिर्य उत्पन्न हो सकता हैं।

लक्षण

सुनाई कम देना या बिलकुल सुनाई न देना ही इस रोग का लक्षण हैं।

घरेलू चिकित्सा

यद्यपि कारण के अनुसार चिकित्सा अलग – अलग होती हैं। फिर भी निम्नलिखित सामान्य चिकित्सा इस रोग में दे सकते हैं –

  • गेंदे के पत्तों का रस निकालकर सुबह – शाम कान में डालें।
  • तारपीन के तेल में पांच गुणा बादाम रोगन डालकर 15 – 20 मिनट तक खूब हिलाएं। रात को रूई का फाहा भरकर कान में डालें व सुबह निकाल दें।
  • प्याज कूटकर 2 – 3 बूँद दिन में दो बार डालें।
  • नीम की पत्तियां पानी में उबालें। ठंडा होने पर 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
  • 100 ग्राम सरसों का तेल कड़ाही में गर्म करें। जब तेल गर्म हो जाए, तो दो करेले काटकर इसमें डाल दें। करेले जल जाएं तो कड़ाही उतार लें। ठंडा होने पर छानकर रखें व 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
  • ताजा गो – मूत्र 2 – 3 बूँद सुबह – शाम डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

अपामार्गक्षार तेल, बिल्व तेल, दशमूल तेल, हिंगुत्रिगुण तेल, कर्ण बिंदु तेल का प्रयोग कर सकते हैं।

 

 

कान दर्द

कारण

कान इके अन्दर मैल फूल जाने, घाव हो जाने, कान में सूजन होने या संक्रमण के कारण कान में दर्द होता हैं। गले या नाक में संक्रमण होने पर समय रहते चिकित्सा न की जाए, तो उससे भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

कान का सूजना, कान से मल निकलना, कानों में रूक – रूक कर दर्द होना आदि।

घरेलू चिकित्सा

  • तुलसी के पत्तों का रस निकलकर गुनगुना कर लें और दो – तीन बूँद सुबह – शाम डालें।
  • नींबू का रस गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
  • प्याज का रस निकालकर गुनगुना करके 2 – 3 बूँद सुबह – शाम कान में डालें।
  • बकरी का दूध उबाल कर ठंडा कर लें। जब गुनगुना रह जाएं, तो इसमें सेंधानमक मिलाकर 2 – 3 बूँद दोनों कानों में टपकाएं।
  • मूली के पत्तों को कूटकर उसका रस निकालें। रस की एक तिहाई मात्रा के बराबर तिल के तेल के साथ आग पर पकाएं। जब केवल तेल ही बचा रह जाए, तो उतार कर छान लें। कान में 2 -3 बूँद डालें।
  • कपूर व घी समान मात्रा में लेकर पकाएं। पकने पर उतार कर ठंडा कर लें व 2 – 3 बूँद कानों में डालें।
  • आक के पत्तों का रस, सरसों का या तिल का तेल तथा गोमूत्र या बकरी का मूत्र बराबर मात्रा में लेकर थोड़ा गर्म करें और कान में 2 – 3 बूँद डालें।
  • लहसुन की दो कलियाँ छीलकर सरसों के तेल में डाकार धीमी आंच पर पकाएं। जब लहसुन जलकर काला हो जाए, तो उसे उतार कर ठंडा करें व छान कर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
  • अदरक का रस, सेंधानमक, सरसों का तेल व शहद बराबर मात्रा में लेकर गर्म करें और गुनगुना होने पर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
  • आक की पकी हुई पीली पत्ती में घी लगाकर आग पर गर्म करें। इसे निचोड़कर रस निकालें व दो – तीन बूँद कानों में डालें।
  • आम की पत्तियों का रस निकालकर गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

महत्पंचमूल सिद्ध तेल, सुरसादि पक्व तेल का प्रयोग किया जा सकता हैं। रामबाण रस, लक्ष्मीविलास रस व संजीवनी वटी का प्रयोग खाने के लिए करें।

 

 

कान बहना

कारण

जुकाम, खांसी या गले के संक्रमण की चिकित्सा न की जाए, तो कान में भी संक्रमण हो जाता हैं। छोटे बच्चे जिनका गला खराब हो या खांसी हो, जब कान में मुंह लगाकर धीरे से कोई बात करते हैं, तो सांस के साथ रोग के जीवाणु कान में पहुँच जाते है। कान में फोड़ा – फुंसी हो, पानी, रूई या अन्य कोई बाहरी वस्तु कान मे रह जाए, तो भी कान में संक्रमण हो सकता हैं।

लक्षण

रोगी के कान से बदबूदार स्राव या मवाद बाहर निकलती हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • लहसुन की दो कलियाँ व नीम की दस कोपलें तेल में गर्म करें। दो – दो बूँद दिन में तीन – चार बार डालें।
  • 150 ग्राम सरसों का तेल किसी साफ़ बर्तन में डालकर गर्म करें और गर्म होने पर 10 ग्राम मोम दाल दें। जब मोम पिघल जाए तो आग पर से उतार लें और इसमें 10 ग्राम पिसी हुई फिटकरी मिला दें। 3 – 4 बूँद दवा सुबह – शाम कान में डालें।
  • 2 पीली कौड़ी का भस्म 200 मिली ग्राम व दस ग्राम गुनगुने तेल में डालें। छानकर 2 – 3 बूँद कान में डालें।
  • नींबू के रस में थोड़ा सा सज्जीखार मिलाकर 2 – 3 बूँद कान में टपकाएं। आग से उतार कर ठंडा करें व छानकर रख लें। 2 – 3 बूँद कान में डालें।
  • 10 ग्राम रत्नजोत को 100 ग्राम सरसों के तेल में जलाएं। ठंडा होने पर छानकर रखें और 2 – 3 बूँद कान में डालें।
  • धतूरे की पत्तियों का रस निकालकर थोड़ा गुनगुना करें व 2 – 3 बूँद कान में डालें।
  • नीम की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
  • तुलसी की पत्तियों का रस 2 – 3 बूँद कान में डालें।
  • आधा चमच्च अजवायन को सरसों या तिल के तेल में गर्म करें। फिर आंच से उतार लें। गुनगुना रह जाने पर 2 – 3 बूँद डालें।

आयुर्वेदिक औषधियां

आरग्वधादि क्वाथ से कान को धोएं। पंचवकल क्वाथ या पंचकषाय क्वाथ का प्रयोग भी किया जा सकता हैं। समुद्रफेन चूर्ण का प्रयोग भी लाभदायक होता है।

 

नासास्रोत शोथ

कारण

चेहरे की हड्डियों में स्थित गुहाएं (रिक्त स्थान) जोकि नाक से सम्बद्ध हैं, साइनस कहलाती हैं। ये स्लेश्म्कला से ढकी रहती हैं एवं चार प्रकार की होती हैं और जिस हड्डी में स्थित हैं, उनके अनुसार इनका नामकरण किया गया हैं। जुकाम या इन्फ्लुएंजा के उपद्रव के रूप में या संक्रमण के कारण इनमें सूजन आ जाने को साइनुसाइटिस या नासास्रोत शोथ कहते हैं।

लक्षण

किसी साइनस में शोथ होने पर एक ओर नासिका से स्राव होता हैं, साथ ही वेदना की शिकायत भी रहती हैं। जिस साइनस में शोथ हो, उसी के अनुसार वेदना की प्रतीति भी माथे व चेहरे के विभिन्न भागों में होती हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • रोगी को पसीना आने वाली दवा दें, ताकि शोथ के कारण पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद नासागुह के छिद्र खुल जाएं। इसके लिए रोगी को अदरक, लौंग, काली मिर्च, बनफशा की चाय पिलाएं।
  • एक ग्राम काली मिर्च को आधा चमच्च देसी घी में गर्म करें। ठंडा होने पर ह्वान लें व दो – तीन बूँद नाक के दोनों छिद्रों में तीन बार डालें।
  • अदरक या सफेदे के पत्ते पानी में उबालकर भाप लें।
  • 5 ग्राम अदरक घी में भूनकर सुबह – शाम लें।
  • 5 ग्राम अदरक को पाव भर दूध में उबालें। यह दूध नाक के नासाछिद्रों में भर कर रखें।
  • जलनेति – 1 लीटर पानी को नमक डाल कर उबालें। गुनगुना रहने पर टोंटीयुक्त लोटे में भरकर बाएँ नाक से पानी लेकर दाएं से निकालें।फिर दाएं से लेकर बाएँ से निकालें। अंत मैं बारी – बारी से दोनों नाकों से पानी लेकर मुंह से निकालें।

पेटेंट दवाएं

सैप्टीलिन गोलियां (हिमालय), सीफाग्रेन गोलियां व नाक में डालने की दवा (चरक) इस रोग में अत्यंत लाभदायक हैं।

आयुर्वेदिक औषधियां

नाग गुटिका, व्योषादि वटी, चित्रकहरीतकी, अवलेह, षड्बिन्दुतेल, अणुतेल आदि दवाओं का प्रयोग कर सकते हैं।

नोट: बताये हुए बिधि को यूज़ करते रहे आपको फायदा अवश्य मिलेगा, और फिर भी मन में कोई संकोच है, तो एक बार डॉक्टर की परामर्श अवश्य लें. हमारे लेटेस्ट जानकारी के पोस्ट को इसी तरह पढ़ते रहे और फायदा प्राप्त करते रहें।

admin

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