कुशिक्षकः सबसे बड़ा शत्रु

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मार्ग दो हैं – सुमार्ग एवं कुमार्ग। सुमार्ग का ज्ञान देने वाला चाहे जो हो वही अपना सुहृद हैं, और कुमार्ग पर ले जाने वाला चाहे अपना प्रियतम हो वही अपना शत्रु हैं। महत्त्वपूर्ण हैं – सुमार्ग , सुशिक्षा एवं सद्गुण। महाकवि भारवि के शब्दों में –

 

“ गुण से भरी हुई शिक्षाएं ग्रहण कर लेनी चाहिए , उनका कहने वाला चाहे जो हो।”

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सद्गुण सदैव फलते हैं। दुर्गुण सदैव दुःखकारक होते हैं  दुर्गुणों के शिक्षक को वैसे ही छोड़ देना चाहिए जैसे सांप अपनी केंचुली को छोड़ देता हैं , भले ही दुर्गुणों की सीख देने वाला जन्म देने वाला अपना पिता ही क्यों न हो।

 

एक प्रसिद्ध चोर था। उसने जीवन में अनेक चोरियां की थी। उसका एक लड़का था। लड़का जब युवा होने लगा तो पिता ने विचार किया कि अब अपने पुत्र को भी अपने व्यवसाय की शिक्षा देनी चाहिए।

 

एक दिन उसने अपने लड़के से कहा – बेटे ! अब मैं वृद्ध हो गया हूँ। मैंने जीवन में हजारों चोरियां की हैं , लेकिन कभी भी चोरी करते हुए पकड़ा नहीं गया हूँ। मैं नहीं चाहता की अब बुढापे में अपने नाम पर कलंक का टीका लगवाऊं। अब मैं विश्राम करूंगा और तुम इस व्यवसाय को शुरू करो। कुछ दिन मैं तुम्हें चोरी के गुर सिखाऊंगा , तुम रात्री में मेरे साथ चला करो।

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पुत्र ने पित्राज्ञा शिरोधार्य कर ली। अब प्रतिदिन पिता – पुत्र रात्रि में चोरी करने जाने लगे। पिता मार्ग में पुत्र को अपने करिश्मे सुनाया करता था। एक दिन पिता ने कहा – देखो वह सामने बहुमंजिली इमारत हैं , मैंने वहा तीन बार चोरी की , अपार धन दौलत मिली।

 

और वह साधारण सा मकान भी देखो , मैंने वहाँ पांच बार चोरी की , वहाँ से बहुत धन नहीं मिला। पिता सुनाता जा रहा था। उसने आगे कहा – देखो , यह झोपडी को इस तरह लूटा कि पानी पीने के लिए एक गिलास भी नहीं छोड़ा।

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पिता अपनी बहादुरी की बात कह कर ठहाका लगा कर हंसने लगा , लेकिन इस झोपडी के आठ बार लुटने की बात सुनकर पुत्र गंभीर हो गया। उसने कहा – पिताजी ! तुमने इस दरिद्र झोपडी को आठ बार लूटा हैं। और प्रत्येक बार तुमने एक गिलास तक इसमें शेष न रहने दिया। लेकिन देखो – इस झोपडी में आज भी दिया जल रहा हैं।

 

पुनः  पुनः बर्बाद होकर भी यह झोपडी आबाद हैं। और तुम जिसने हजारों घरों का धन चुराया हैं , मैंने कभी तुम्हारे घर में दिया जलते हुए नहीं देखा। मैं ऐसे धन पर थूकता हूँ। ठुकराता हूँ तूम्हारा व्यवसाय। मुझे ऐसा धन नहीं चाहिए , जो दूसरों को निर्धन – दरिद्र बना कर प्राप्त किया जाता हैं।

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तुम दूसरों के घरों का धन संचय करके भी अपने घर को प्रकाशित नहीं कर पाए हो। लेकिन ये झोपड़ियां आज भी आबाद हैं। धिक्कार हैं इस धन और इस व्यवसाय पर।

 

और पुत्र ने दृढ निश्चय करके अपने पिता के दुर्व्यववसाय को ठुकरा दिया। उसने मेहनत करके पेट भरने का निर्णय लिया।

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