झूठा वैराग्य – ज्ञान से भरपूर हिंदी कहानी

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एक सुन्दर सूक्ति हैं –

इस असार संसार में शरीरधारियों के लिए सुख केवल भ्रान्ति हैं।

सुख असार संसार में नहीं हैं। फिर भी अज्ञानी जन संसार में सुख ढूंढते रहते हैं। संसार की दग्ध्ताएं कदम – कदम पर अपनी आंच से मनुष्य को जलाती हैं लेकिन फिर भी वह संसार से चिपक कर रहना चाहता हैं।

महापुरुषों ने संसार के सुख को मिर्च के रस की उपमा दी है। मिर्च मुंह को जलाती हैं , फिर भी वह घर – घर में खायी जाती हैं। जलन सह कर भी मनुष्य उसे खाता रहता हैं।

एक दिन एक महात्मा के पास चार सज्जन आये। चारों के मुखड़ों से लग रहा था की वे संसार से ऊब चुके हैं। संसार में उन्हें कोई रस नहीं रहा हैं।

महात्मा से तत्त्वचर्चाएं चली। महात्मा ने संसार के स्वरुप और आत्मस्वरुप की तत्त्व – चर्चाएं सुनाई। वे चारों आत्म – आनंद में डूबकर गर्दन हिला रहे थे। उनमे से एक बोला –

महात्मा जी ! संसार तो स्वार्थ का घर हैं। यहाँ पत्नी , पुत्र , यार , दोस्त कोई किसी का नहीं हैं। सब मतलबी हैं।

दुसरे सज्जन ने अपने विचार रखे – संसार में बेईमानी बहुत बढ़ गयी हैं। अब सज्जनों का जीना मुश्किल हो गया हैं यहाँ।

तीसरे ने कहा – संसार तो दुखों और चिंताओं का घर हैं। इससे तो भगवान् ही रक्षा करें।

चौथे सज्जन ने अपने विचार प्रस्तुत किये – गुरुदेव ! मैं भी संसार की अधार्मिकता से ऊब चुका हूँ। निःसार हैं सारा संसार।

चारों सज्जनों की संसार के सन्दर्भ में टिप्पणियाँ सुनकर संत बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सोचा – चलो , चार सज्जन पुरुष तो मिले। इन्हें संन्यास की सीख दी जाए।

वे बोले – भाइयों ! तुम इस संसार की कुरूपता से भलीभांति परिचित हो चुके हो। ऐसा करो , तुम संत बन जाओ। लेकिन यह क्या ? चारों ही गायब हो चुके थे। महात्मा अपना सिर धुनने लगे ऐसे विरागियों पर।

admin

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