क्षमा वीरों का आभूषण होता हैं

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क्षमा ह्रदय का अमृत हैं। इस अमृत को शूरवीर ही अपने ह्रदय में धारण कर सकते हैं। कहावत हैं –

    क्षमा वीरस्य भूषणम।

क्षमा शूर – वीरों का आभूषण होता हैं।

इस सन्दर्भ में देखिये इंद्रभूति गौतम के जीवन का एक प्रसंग।

इंद्रभूति गौतम भगवान् महावीर के ज्येष्ठ शिष्य थे। वे चौदह हजार श्रमणों और छत्तीस हजार श्रमणियों के अनुशास्ता थे। लेकिन इस पर भी वे विनम्रता और क्षमाप्रधान जीवन की जीवंत प्रतिमा थे।

एक दिन भगवान् महावीर ने गौतम स्वामी को अपने प्रबुद्ध श्रावक आनंद को दर्शन देने के लिए भेजा। गौतम स्वामी आनंद श्रावक के घरे पहुंचे। आनंद श्रावक गौतम स्वामी के दर्शन करके और भगवान् महावीर का धर्मसन्देश पाकर कृतकृत्य हो उठे।

वार्तालाप के मध्य , आनंद श्रावक ने गौतम स्वामी को बताया कि मुझे अवधिज्ञान की प्राप्ति हुई हैं। गौतम स्वामी को आनंद श्रावक की बात पर विश्वास नहीं हुआ। वे बोले – श्रावक जी ! आप झूठ बोल रहे हैं। आनंद श्रावक बोले – प्रभु ! मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ। मैं सत्य बोल रहा हूँ।

लेकिन तब भी गौतम स्वामी को विश्वास नहीं हुआ। वे लौटकर भगवन महावीर के पास आए और पूछा – क्या आनंद सत्य बोल रहे थे कि उन्हें अवधिज्ञान प्राप्त हुआ है ?

भगवान् महावीर बोले – हाँ , गौतम ! आनंद अक्षरशः सत्य बोल रहे थे। उन्हें अवाधिज्ञान की प्राप्ति हुई हैं।

भगवान् महावीर की बात सुनकर गौतम निःशंक हो उठे। लेकिन उनकी आत्मा पश्चात्ताप से भर उठी कि उन्होंने एक सच्चे श्रावक को झूठा कहा। वे खड़े पाँव तुरंत लौट चले आनंद श्रावक के घर की ओर। और मीलों का सफर पार करके वे आनंद श्रावक के घर पहुंचे। आनंद गौतम की प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रावक ने अपने गुरु के चरणों में शीश झुका दिया। गौतम स्वामी बोले – श्रावक जी ! मुझे क्षमा कर दो। मैंने आपको असत्यभाषी कहा है।

गौतम स्वामी जैसे शूरवीर ही क्षमा धर्म के महान साधक हो सकते हैं।

admin

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