बच्चों के रोग

बच्चों के रोग के कारण एवं उपचार

सूखा रोग rickets

कारण

यह रोग विटामिन डी की कमी के कारण होता हैं। विटामिन डी आँतों में से मुख्य रूप से कैल्शियम और गौण रूप से फॉस्फोरस के विलयन में सहायक होता हैं। विटामिन डी की कमी के कारण हड्डियों में कैल्शियम फास्फेट, जो साधारणतः 60 – 65 प्रतिशत तक होता हैं, घटकर 20 – 25 प्रतिशत तक रह जाता हैं। जिससे बच्चों में अस्थिशोष या सूखा रोग हो जाता हैं। वयस्कों में विटामिन डी की कमी से अस्थि मृदुता नामक रोग हो जाता हैं।

जिन बच्चों को माँ का दूध नहीं मिलता या जिन बच्चों को प्रायः अंधेरे में रखा जाता हैं अथवा जिन्हें जल्दी अन्न शुरू करा दिया जाता हैं, उन बच्चों को विटामिन डी न मिलने से यह रोग हो जाता हैं। माँ के दूध में व सूर्य के प्रकाश में प्राकृतिक रूप से यह विटामिन होता हैं। जिन बच्चों को दस्त की शिकायत रहती हो, उनको भी सूखा रोग हो जाता हैं, क्योंकि विटामिन डी वसा में विद्यमान होता हैं और दस्तों के साथ वसा शरीर से बाहर निकलता हैं। अजीर्ण के कारण भी यह रोग हो सकता हैं, क्योंकि बिना पचे अन्न में फॉस्फोरस युक्त एक अम्ल होता हैं, जो कैल्शियम को शरीर से बाहर निकाल देता हैं।

लक्षण

अस्थि निर्माण भली – भांति न होने के कारण पसलियों के अगले सिरे कुछ मोटे हो जाते हैं, जिससे उरोस्थि के दोनों ओर पसलियों में गांठें सी दिखाई पड़ती हैं। रोग अधिक तीव्र हो, तो मृदु होने के कारण पसलियों के अगले सिरे अन्दर की ओर धंस जाते हैं, जिससे उरोस्थि आगे को उभरी हुई दिखाई पड़ती हैं। कलाई कुछ मोटी दिखाई देती हैं। टांग की हड्डियां आगे और बाहर की ओर मुद जाती हैं, जिससे घुटने एक दुसरे से काफी दूर हो जाते हैं। यदि जन्म के समय से साल भर तक बच्चों में विटामिन डी की कमी हो, तो हाथों के बल चलने पर भार पड़ने के कारण दोनों बाजुएँ भी बाहर की ओर मुड़ सकते हैं। बालक के दांत जो प्रायः 6 – 8 महीने में निकल जाते हैं, देर से निकलते हैं। दांतों में कुछ कालापन आ जाता हैं व उनमें दर्द भी होता हैं। रक्त में हिमोग्लोबिन की मात्रा कम होने से शरीर में पीलापन रहता हैं। मांसपेशियाँ कमजोर व ढीली होती हैं, जिससे पेट लटका हुआ दिखाई देता हैं। बच्चे को बदबूदार व फीके रंग के दस्त होते रहते हैं व पेट में कुछ अफारा दिखाई पड़ता हैं। कूल्हे की हड्डियों में भी विषमता आ जाती हैं और इस रोग से ग्रस्त लडकियों में बड़ी होने पर प्रसव संबंधी कठिनाई आ सकती हैं। रीढ़ की हड्डी प्रभावित होने से कुबड़ापन भी हो सकता हैं।

घरेलू चिकित्सा

प्रतिरोधक चिकत्सा

शिशु को कम से कम 9 महीने तक माँ का दूध पिलाना चाहिए। यदि माता को दूध न उतर रहा हो, तो उसके लिए दवाएं माता को दें। विकल्प रूप में बच्चों को गाय का दूध दें, यद्यपि उसमें भी विटामिन डी की मात्रा कम ही होती हैं, तो भी पाचक होता हैं। बच्चे को अन्न कम मात्रा में तथा मक्खन पर्याप्त मात्रा में दें। शीतकाल में बच्चों को थोड़ी देर धूप दिखाएं। गर्मी के मौसम में केवल उषाकाल में कुछ क्षण धूप दिखा सकते हैं।

प्रतिशोधात्मक चिकित्सा

  • असगंध और छोटी पिप्पली बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनाएं और आधा – आधा ग्राम चूर्ण सुबह – शाम के समय माँ के दूध के साथ बच्चे को दें।
  • सत गिलोय और तुलसी के बीज 5 – 5 ग्राम मिलाकर रख लें। इसमें से 1 – 1 ग्राम दवा, 1 चमच्च चूने का पानी और आधा चमच्च खजूर के स्वरस के साथ मिलाकर सुबह – शाम माता के दूध के साथ दें।
  • पके आम का गूदा दूध में मिलाकर सुबह – शाम दें या आम का गूदा सुखाकर व कूटकर रख लें। इसका 1 चमच्च चूर्ण 1 चमच्च शहद के साथ सुबह – शाम लें।
  • बच्चे को टमाटर खाने को दें। यदि बच्चा अधिक छोटा हैं या अधिक टमाटर न खा सके, तो टमाटर का रस पिलाएं।
  • संतरे में कैल्शियम पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता हैं। रोगी को दिन में कई बार संतरे खाने को दें या संतरे का रस पिलाएं।
  • चौलाई का साग नियमित रूप से खाने को दें। साथ में पालक भी ले सकते हैं।
  • दूध व मक्खन का अधिकाधिक प्रयोग कराएं।

आयुर्वेदिक औषधियां

जहर मोहरा खताई भस्म, अरविन्दासव, मुक्तादिवटी, मोती पिष्टी, मोती भस्म, प्रवाल भस्म, लघु वसन्तमालती रस, कर्कटक भस्म, कच्छपृष्ठ भस्म।

पेटेंट औषधियां

बोनीहील गोलियां व के.जी. टोन सीरप (एमिल), बोनिसन सीरप (हिमालय), कैलेम गोलियां (माहेश्वरी ), बालकेसरी सीरप (संजीवन)।

 

 

नाभिपाक infected umblicus

प्रसव के समय स्वच्छता का ध्यान न रखने और प्रसव के समय प्रयुक्त उपकरणों के निर्जीवाणुकरण (स्टरलाइज) न होने के कारण शिशुओं में नाभिपाक की शिकायत होती हैं।

घरेलू चिकत्सा

  • नीम के पत्तों को पानी में उबालकर ठंडा करें और फिर उस पानी से नाभि को धोएं।
  • नाभि को साफ़ करके उस पर अत्यंत बारीक पिसी हुई हल्दी का चूर्ण छिड़कें या हल्दी के चूर्ण को देसी घी में मिलाकर लगा सकते हैं।

आयुर्वेदिक औषधियां

जात्यादि तेल अथवा निम्ब तेल का प्रयोग किया जा सकता हैं।

 

 

गलघोंटू diptheria

कारण

यह रोग प्रायः 2 – 7 वर्ष की आयु के बच्चों में होता हैं। यह डिप्थीरिया बेसिलस नामक जीवाणु से फैलता हैं। इसका संक्रमण गले से शुरू होता हैं और धीरे – धीरे सारे शरीर में फैल जाता हैं। यदि उचित समय में इसकी चिकित्सा न की जाए तो यह रोग घातक सिद्ध होता हैं।

संक्रमित रोगी के छींकने या खासने से इस रोग के जीवाणु फैलते हैं। जिन बच्चों के गले में पहले ही संक्रमण या सूजन हो, उनमें यह रोग होने की संभावना अधिक होती हैं। गले में संक्रमण के साथ ही यह जीवाणु का विष छोड़ता हैं, जो बहुत जल्दी सारे शरीर में फैल जाता हैं।

लक्षण

गले में सफ़ेद चमड़ी एक झिल्ली बन जाती हैं, जो इस रोग का विशेष चिन्ह होता हैं। झिल्ली के चारों ओर की स्लेश्मकला में सूजन होती हैं। शरीर में विष फैलने के साथ ही बुखार, सुस्ती व कमजोरी के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। गले में सूजन आने से सांस लेने में कठिनाई महसूस होती हैं। मस्तिष्क व ह्रदय के मांस में विष फैलने के साथ ही रोगी के बचने की संभावना कम होती चली जाती हैं। इसमें तापमान 100 0 फारेनहाइट के करीब होता है, नाड़ी तेज (प्रति मिनट 110 के लगभग ) होती हैं। इसमें गला ज्यादा नहीं दुखता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • कच्चे पपीते का ताजा रस इस रोग में विशेष रूप से लाभदायक होता हैं। पपीते का रस व शहद मिलाकर गले में लगाने से झिल्ली समाप्त होती चली जाती हैं और संक्रमण की वृद्धि तत्काल रूक जाती हैं। साथ ही रोगे की हालत में सुधार आता चला जाता हैं।
  • लहसुन भी इस रोग में विशेष रूप से प्रभावी हैं। रोगी को लगातार लहसुन चूसते रहना चाहिए। लहसुन के रस से सफ़ेद झिल्ली समाप्त होती चली जाती हैं, संक्रमण की वृद्धि रूक जाती हैं और रोगी ठीक होना शुरू हो जाता हैं। दिन भर में कम से कम 10 ग्राम लहसुन का रस रोगी को चूसना चाहिए।

 

 

 

खसरा measels

कारण

यह रोग प्रायः बच्चों में होता हैं। इसमें बच्चों का मुंह कुछ फूला – फूला सा रहता हैं तथा सूंघने पर एक विशेष प्रकार की गंध आती हैं। यह एक संक्रामक रोग हैं, जो रोगी के छींकने, खांसने व बोलने से फैलता हैं, क्योंकि रोगी की आँखों, गले व नाक से निकले श्राव में इस रोग का वायरस मौजूद रहता हैं।

लक्षण

बच्चे को जुकाम रहता हैं व छींकों के साथ पाने निकलता हैं। गले में खराश के साथ सूखी खांसी होती हैं। बुखार के साथ आँखों में दर्द व लाली रहती हैं। 3 – 4 दिन के बाद गुलाबी या लाल रंग के दाने शरीर पर निकल जाते हैं। जो अगले 3 – 4 के बाद मुरझाने लगते हैं और बुखार उतरना शुरू हो जाता हैं।

बच्चे को कान में सूजन व संक्रमण हो सकता हैं। श्वसनक ज्वर (न्युमोनिया) भी काफी बच्चों में देखा जाता हैं। आँखों में सूजन रहने के कारण घाव भी बन सकते हैं, जिनकी उपेक्षा करने पर ही दृष्टि दोष हो सकता हैं। ऐंठन प्रायः बच्चों में हो जाती हैं। इसके अतिरिक्त मुंह में घाव, आंत्रशोथ आदि रोग की उपद्रव स्वरुप हो सकते हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • हलदी का पिसा हुआ बारीक चूर्ण चौथाई चमच्च से लेकर 1 चमच्च तक करेले के स्वरस के साथ दें। रोगी बालक की उम्र और शारीरिक बल को देखकर सुबह – शाम देना चाहिए।
  • हरड़, बहेड़ा, आंवला, गिलोय, अडूसा, नीम की छाल और कत्था बराबर मात्रा में लेकर इनका काढ़ा बनाकर रखें। 10 – 20 बूँद सुबह – शाम दें।
  • करेले की पत्तियों के 4 चमच्च रस में 1 चमच्च शहद व 2 चुटकी हलदी का चूर्ण मिलाकर सुबह – शाम लें।
  • जौ का पानी उबालकर रोगी को बार – बार दें।

आयुर्वेदिक औषधियां

     खदिरारिष्ट, स्वर्ण भस्म, लौह भस्म।

     पेटेंट औषधियां

     निरोसिल सीरप व गोलियां (एलारसिन)।

 

 

 

चेचक chickenpox

कारण

यह रोग प्रायः बच्चों में होता हैं, किन्तु किशोरों, युवाओं व वयस्कों में भी हो सकता हैं। यह विषाणु (वायरस) जन्य संक्रामक रोग हैं तथा रोगी के खांसने, छींकने व बोलने से फैलता हैं।

लक्षण

इस रोग में शरीर में टूटन व दर्द, खुजली, सारे शरीर पर सूजन व लाली, जुकाम के साथ बुखार धीरे – धीरे बढ़ने लगता हैं। 3 – 4 दिन के बाद शरीर पर दाने निकल आते हैं जिनमें जलन व दर्द होता हैं।

प्रतिरोधक चिकित्सा

जिस क्षेत्र में यह रोग फैलना शुरू हो जाए, वहाँ के लोग निम्नलिखित में से किसी एक उपाय अपनाने से रोग से बच सकते हैं :

  • 2 काली मिर्च और 5 नीम की कोंपले सुबह खाली पेट 1 सप्ताह तक चबाएं। बच्चों को थोड़ी सी मिसरी भी साथ में दे सकते हैं।
  • बच्चों को 1 चमच्च व बड़ों को 4 चमच्च की मात्रा में गोले (नारियल) का तेल पिलाएं या गोला खाने को दें।

प्रतिषेधक चिकित्सा

  • नीम की कोंपले और तुलसी के पत्तों को पीसकर कल्क बनाएं और 10 ग्राम की मात्रा में एक चमच्च शहद के साथ या संभाग मिसरी मिलाकर सुबह के समय खिलाएं।
  • नीम की पत्तियां पीसकर चेचक के दानों पर लगाएं।
  • चावल के धोवन में तुलसी के पत्ते पीसकर पिएं।
  • हर दो घंटे बाद रोगी को मुनक्का के चार दाने खिलाएं।
  • अनार के पत्ते, मुनक्का, गिलोय, मुलेठी और ईख की जड़ सामान भाग लेकर काढा बनाएं। फिर इसमें थोड़ी सी मिसरी मिलाकर 20 मि.ली. सुबह – शाम पिलाएं।
  • बेलगिरी के पके फल का गूदा चार चमच्च की मात्रा में गाय के दूध के साथ सुबह – शाम दें।

घरेलू चिकित्सा

हलदी, दारूहलदी, लाल चन्दन, त्रिफला, चिरायता और नीम की छाल सबको समान मात्रा में लेकर कल्क बनाएं और चार गुणा तेल से सिद्ध करें। सुबह – शाम चेचक के दागों पर इससे मालिश करें।

आयुर्वेदिक औषधियां

आम्लाक्यादि चूर्ण आदि।

 

बाल यकृत वृद्धि infantile cirrhosis of liver

कारण

भोजन में जब वसा और कार्बोहाइड्रेट (40 – 50 प्रतिशत से ) अधिक तथा प्रोटीन (10 प्रतिशत से ) कम मात्रा में रहते हो, तो यकृत के सेलों में वसा के मात्रा बढ़ने से यकृत वृद्धि होते हैं।

जन्म से लेकर 2 – 3 वर्ष की आयु में बच्चों को यह रोग माँ का दूध कम मात्रा में मिलने या बिलकुल न मिलने के कारण होता हैं। गाय – भैसों के दूध में वसा की मात्रा कम करने के उद्देश्य से उसमें लगभग बराबर की मात्रा में पानी मिलाकर बच्चों को देते हैं। वास्तव में ऐसे दूध में वसा की मात्रा कम होने के साथ प्रोटीन की मात्रा बिलकुल ही कम हो जाती हैं। माँ के दूध में घुलनशील प्रोटीन दो तिहाई तथा अघुलनशील एक तिहाई होता हैं, साथ ही माँ के दूध में वसा के दाने बहुत ही छोटे होते हैं। दूसरी ओर गाय के दूध में घुलनशील प्रोटीन एक चौथाई व अघुलनशील तीन चौथाई होते हैं, इसके अतिरिक्त वसा के दानों का आकार भी बड़ा होता हैं, जो आसानी से नहीं पच सकते। इससे यकृत के सेलों में वसा का संचय अधिक होने से वे फैल कर फूल जाते हैं जिससे सेलों को ऑक्सीजन व पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते और यकृत के सेल नष्ट होना शुरू हो जाते हैं। यदि किसी बच्चे को दस्त, अजीर्ण आदि कोई रोग हो रहा हो और इनके जीवाणु अंत में मौजूद हो, तब भी उनके विष से यकृत के सेल नष्ट हो जाते हैं। इससे यकृत के सेलों में स्नायुतंतु बन जाते है, जिससे यकृत की शिराएं पूर्णतः या आंशिक रूप से अवरूद्ध हो जाती हैं और यकृत वृद्धि का कारण बनती हैं।

लक्षण

आँखों में पीलापन, भूख में कमी, पेट का तना रहना व उभरा हुआ दिखना। कब्ज या दस्त रहना, कमजोरी व उदासीनता होना। हल्का बुखार हो सकता हैं। रोग के बढ़ने पर मूत्र की मात्रा कम हो जाती हैं, पेट अधिक उभर आता हैं, मल मिट्टी के रंग का व बदबूदार हो जाता हैं। बुखार लगातार रहने लगता हैं।

घरेलू चिकित्सा

  • बच्चे को माता का दूध ही पिलाएं। माँ का दूध कम उतरने की स्थिति में इलाज कराएं, जिससे दूध पर्याप्त मात्रा में उतर सके।
  • बच्चे को विटामिन ‘बी’ व ‘सी’ युक्त आहार द्रव्य दें। इनमें संतरा व मुसम्मी का रस उत्तम हैं।
  • एक – एक आंवले का रस बच्चे को सुबह – शाम सेंधानमक मिलाकर दें।

आयुर्वेदिक औषधियां

पुनर्नवामंडूर, यकृतहर लौह, यकृदारि लौह, हरीतकी चूर्ण, मंडूर वटी, एम्लीक्योर डी.एस. सीरप, लिव – 52 सीरप, लिवोमिन सीरप।

 

 

बिस्तर पर पेशाब करना bed wetting

कारण

दो से तीन वर्ष की आयु तक आते – आते प्रायः बच्चे का मल – मूत्र संबंधी क्रियाओं पर नियंत्रण हो जाता हैं। यदि पांच वर्ष की आयु के बाद भी बच्चे का मूत्र विसर्जन पर नियंत्रण न हो पाए, तो चिकित्सा की आवश्यकता पड़ती हैं। इस रोग के कारण शारीरिक और मनोवैज्ञानिक भी हो सकता हैं।

लक्षण

बिस्तर पर बिना इच्छा के, विशेष कर रात के समय पेशाब निकल जाना इस रोग का लक्षण हैं।

घरेलू चिकित्सा

मनोवैज्ञानिक

विद्यालय में शिक्षक द्वारा तथा घर पर माता – पिता या परिवार के किसी बड़े सदस्य द्वारा बच्चे के साथ की गयी डांट – डपट या मार – पिटाई इस रोग का कारण बनती हैं। अतः सबसे पहले बच्चे को प्यार से अपने पास बैठाकर कारण जानने का प्रयास करें। यदि बच्चे के दिमाग में डर, मार – पिटाई या किसी भी प्रकार के उत्पीड़न की बात घर कर गई हैं, तो सांत्वना देकर बच्चे को सामान्य व्यवहार में ले आएं। विद्यालय या घर के वातावरण का कोई डर यदि बच्चे के दिमाग में हैं, तो बातचीत कर कारण को दूर करें।

शारीरिक

शारीरिक कारणों में पेट में कीड़े होने के अतिरिक्त स्नायविक दुर्बलता ही प्रमुख कारण हैं, जिसके लिए निम्नलिखित चिकित्सा दे सकते हैं –

  • रात को सोने से दो – तीन घंटे पहले ही बच्चे को दूध पिला दें व इसके बाद तरल पदार्थ देने से बचें।
  • 2 गुरबंदी बादाम की गिरी व दो किशमिश घी में भूनें, ऊपर से दूध डाल दें। सुबह खाली पेट पहले दूध में से बादाम व किशमिश निकालकर बच्चों को खिलाएं व ऊपर से दूध पिला दें।
  • एक अखरोट की गिरी व पांच – छः किशमिश खिलाएं। 3 वर्ष के बच्चे में खुराक की मात्रा आधी कर लें।
  • धनिये के बीजों का चूर्ण तवे इतना भूनें कि वह लाल रंग का हो जाए। उसमें बराबर की मात्रा में तिल का तेल, कीकर का गोंद व अनार के फूल मिलाकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण सोते समय बच्चे को दूध के साथ दें।
  • यदि पेट में कीड़े हो, तो कीड़े की दवाई दें।
  • सूखा आंवला व काला जीरा बराबर मात्रा में लेकर कूट – पीस लें। इन दोनों के वजन से तीन गुना ज्यादा मात्रा में इसमें शहद मिला लें। एक – एक चमच्च दवा सुबह – शाम चटाएं।
  • राय का चूर्ण 1 ग्राम दिन में तीन बार पानी के साथ दें।
  • एक भाग अजवायन, दो भाग काले तिल व चार भाग पुराना गुड़ लें। तिल व अजवायन को कूट कर गुड़ में मिलाएं। एक – एक चमच्च दवा दिन में दो बार दूध के साथ दें।

आयुर्वेदिक औषधियां

बंग भस्म, शुद्ध हिंगुल, कुचला, शतावरी, नियो गोलियां (चरक)

admin

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